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12 वर्षीय शटलर लगाएगी भारत के लिए गोल्डन दांव, कभी उनका खेल देख पीवी सिंधु हुई थीं हैरान

गोरखपुर, अनुराग पाण्डेय: कहते हैं मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है, पंख से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है... यह कहावत उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की 12 वर्षीय बैडमिंटन खिलाड़ी () पर सटीक बैठती है। जन्म के बाद से ही आदित्या सुन और बोल नहीं सकती हैं, लेकिन उनका हौसला उड़ान भर रहा है। वह ब्राजील में होने वाले मूक ओलिंपिक (Deaflympics Games) की तैयारियों में जुटी हुई हैं और गोल्ड जीतने का सपना देख रही हैं। उन्होंने माता-पिता से वादा किया है कि वह गोल्ड मेडल जीतेंगी। परिवार और जानने वालों के बीच गोल्डन गर्ल के नाम से मशहूर आदित्या मूकबधिर ओलिंपिक में भारत की ओर से खेलने वाली सबसे कम उम्र की खिलाड़ी भी होंगी। आदित्या के पिता दिग्विजय यादव ने नवभारत टाइम्स ऑनलाइन को बताया कि नई दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में 26 से 28 फरवरी तक आयोजित सिलेक्शन ट्रायल में उनका चयन हुआ। बैडमिंटन के ट्रायल में कुल 16 महिला शटलरों ने क्वॉलिफाइ किया था। इनमें चार महिला खिलाड़ियों का चयन ओलिंपिक के लिए हुआ है। जुनून देखकर पीवी सिंधु भी रह गई दंगआदित्या यादव जब दस साल की थीं तो उन्होंने चाइना में आयोजित वर्ल्ड चैम्पियनशीप में अपने टैलेंट का लोहा मनवाया था। जब दिल्ली में आदित्या एक टूर्नामेंट में खेल रही थीं तब देश की महान बैंडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु भी उनके गेम से आकर्षित हुई थीं। दो बार की ओलिंपिक मेडलिस्ट सिंधु ने उनकी तारीफ करते हुएए कहा था, 'आदित्या का गेम अच्छा है इसे आगे ले जाइए। कोई दिक्कत हो तो हमें भी बताइए। सिंधु ने आदित्या को कई अच्छे टिप्स भी दिए थे। आदित्या नहीं मनाती संडेआदित्या के पिता दिग्विजय भी एक अच्छे बैंडमिंटन खिलाड़ी रहे हैं और फिलहाल रेलवे में कोच हैं। वह बताते हैं, 'आदित्या यादव बैडमिंटन को लेकर जुनूनी हैं। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि पिछले दो साल से आदित्या ने संडे नहीं मनाया। कोरोना काल में के दौरान घंटों प्रैक्टिस करती थीं। उस दौरान फिटनेस पर पूरा ध्यान दिया।' जब पैदा हुई तो घरवाले हो गए थे उदासजब आदित्या का जन्म हुआ उसके तीन साल बाद घर वाले यह जानकारी मिली कि वह सुन-बोल नहीं सकती है। मिडिल क्लास फैमिली में इस तरह की बेटी या बेटो को पालना एक और चुनौती होती है। इस बात से घरवाले शुरुआत में परेशान हो गए, लेकिन तारीफ करनी होगी दिग्विजय की। उन्होंने फैसला किया कि जिस चीज में वह खुद माहिर हैं बेटी को वही सिखाएंगे। उन्हें बेटी में बैडमिंटन को लेकर ललक भी देखी। दिग्विजय बताते हैं, 'एक दिन जब आदित्या ने रैकेट पकड़ा उसके पकड़ने के ढंग से ये लगा कि वह खेल सकती है। पांच साल की उम्र में आदित्या खेलने जाने लगी। उसने छोटी सी उम्र में ढेरों मेडल जीते हैं। इस वजह से ही तो कहा करते हैं।


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