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तीन हार से शुरुआत, फिर किस्मत का साथ, भारतीय महिला हॉकी टीम ने यूं रचा इतिहास

तोक्यो इन तस्वीरों को फ्रेम करवा लीजिए। ये इतिहास बनातीं तस्वीरें हैं। इन तस्वीरों को पीढ़ियां देखेंगी। और आप खुद को खुशकिस्मत समझेंगे कि आपने इन्हें जीवंत देखा है। 60 मिनट के खेल ने 41 साल के गम को हल्का कर दिया। भारतीय महिला हॉकी टीम पहली बार सेमीफाइनल में पहुंची है। इतिहास में पहली बार। और वो भी दिग्गज ऑस्ट्रेलिया को हराकर। दो दिन में भारतीय हॉकी के लिए दो यादगार खबरें। रविवार को पुरुषों ने ग्रेट ब्रिटेन को हराकर 49 साल बाद सेमीफाइनल में जगह बनाई और इसके बाद सोमवार को महिला टीम ने कमाल कर दिया। ऑस्ट्रेलिया को ऐसी टीम माना जाता है जो विपक्षी खेमे में घुसकर खेलती है। ग्रुप स्टेज में उसने अपना दबदबा यूं ही दिखाया। उसने कोई मैच नहीं गंवाया। आज के मुकाबले से पहले उसने सिर्फ एक गोल किया था। उन्हें अपने खेल पर यकीन था और हमें अपने जज्बे पर। भारतीय महिला टीम की खिलाड़ियां आपस में सिर्फ गले नहीं मिल रही है बल्कि हर उस शख्स को जवाब दे रही हैं जिसने उन्हें कमतर आंका था। जिसने कहा था कि इस टीम से ज्यादा उम्मीदें नहीं। एक के बाद एक शुरुआती तीन मैच हारने के बाद ऐसी आवाजें बुलंद होती गईं। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। लगी रहीं और जुटी रहीं। यह वाकई इस टीम का 'चक दे' मूवमेंट है। ऑस्ट्रेलियाई टीम ने जब दूसरे क्वॉर्टर में गोल खाया तब भी उसे लग रहा था कि वापसी कर सकता है। एक नहीं, दो नहीं बल्कि तीन-चार गोल के साथ। आखिर यही ऑस्ट्रेलियाई अंदाज है। पर हमारे साथ थी हिम्मत। टीम ने ग्रुप स्टेज पर शुरुआत तीन हार के साथ की। इसके बाद लगने लगा कि अब आगे का रास्ता लगभग बंद है, लेकिन टीम ने लगातार दो मैच जीते। आखिरी मैच तो साउथ अफ्रीका के खिलाफ आखिरी मिनटों में गोल करके अपने नाम किया। इसके बाद किस्मत का साथ चाहिए था। आयरलैंड और ग्रेट ब्रिटेन के मुकाबले पर भारत का भविष्य टिका था। यहां भी पासा सही पड़ा। टीम अंतिम आठ में पहुंची। और फिर क्वॉर्टर फाइनल में उसने तीन बार की चैंपियन कंगारू टीम को मात दी। ऑस्ट्रेलिया को कई पेनाल्टी कॉर्नर मिले। लेकिन भारतीय डिफेंस और गोलकीपर सविता पूनिया ने गेंद को गोल पोस्ट से दूर रखा। ऑस्ट्रेलियाई टीम ने कई बार अपनी रणनीति बदली। लंबे शॉट्स लगाए। भारतीय टीम को छकाने की कोशिश की। लेकिन फिर भी वह गोलकीपर से आगे नहीं जा पाई। ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों की इस तस्वीर को देखिए। झुके हुए कंधे और घुटनों पर हाथ। यह उनकी हताशा और निराशा की तस्वीर है। जैसे वे भी यह मानकर उतरी हों कि नतीजा तो सब जानते हैं, हमे सिर्फ मैदान पर उतरकर औपचारिकता पूरी करनी है। लेकिन भारतीय टीम ने दिखाया कि 60 मिनट का वक्त बहुत होता है इतिहास बनाने के लिए। ऑस्ट्रेलिया ने शुरुआत अपने अंदाज में की। आक्रामक। विपक्षी टीम को शुरुआत में ही दबाव में लाने की रणनीति। उसे मौका भी मिला। अगर वह यहां उसका फायदा उठा लेती तो तस्वीर दूसरी हो सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऑस्ट्रेलिया चूका और भारतीय टीम ने आश्वस्त किया की येलो जर्सी को गोल से महरूम ही रखा जाए। ऐसा नहीं कि कंगारू टीम ने गोल पोस्ट पर प्रयास नहीं किए। लेकिन ज्यादातर बार वह गोल पोस्ट के करीब से गुजर गए। और बाकी को दीवार की तरह सविता पूनिया ने रोका। उनका खेल आज बाकमाल था। ऑस्ट्रेलियाई अग्रिम पंक्ति इस किले को भेद नहीं पाई। वह गेंद को रोकतीं, डिफेक्लेक्ट करती और भारतीय टीम पर आने वाले खतरे को टालती। मैच से पहले बहुत कम लोगों को यकीन होगा कि नतीजा भारतीय टीम के पक्ष में आएगा। लेकिन रानी रामपाल की कप्तानी वाली टीम ने वह कर दिखाया जो उनसे पहले कोई भारतीय महिला हॉकी टीम नहीं कर पाई थी।


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