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शेख रशीद का अंडर-19 वर्ल्ड कप में धमाल, 'यह एक पिता की मेहनत, जुनून और त्याग की कहानी है'

हैदराबाद: 'जब तुम्हारा बेटा पैदा हुआ तो उस समय किसी महान खिलाड़ी का निधन हुआ था?', शेख बालिशवली के लिए यह सवाल काफी अजीब था। मंगलागिरी के करीब कोचिंग सेंटर में बाकी के अभिभावक अकसर उनसे यह सवाल पूछते थे। मंगलागिरी आंध्र प्रदेश के गुंटूर के करीब एक उपनगर है। आंध्र प्रदेश क्रिकेट असोसिएशन की यहां अकामदी है। बालिशवली, अकसर अपना सिर खुजाते और सोचते कि आखिर कोई ऐसा सवाल क्यों पूछेगा। जल्द ही इस बात का खुलासा हो गया। उन्हें पता लगा कि उनका बेटा बाकियों से काफी आगे है। सबसे हटकर। बालिशवली को क्रिकेट के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। खेल के महारथियों को तो छोड़ ही दीजिए। जब उनके बेटे का चयन की भारतीय टीम में बतौर उपकप्तान हुआ, तो उन्हें लगा कि लोग इसी बारे में बात कर रहे हैं। आखिरकार यह कोई मजाक नहीं था। उनके बेटे की प्रतिभा का एक नमूना अंडर-19 वर्ल्ड के सेमीफाइनल में नजर आया। एंटीगा में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उन्होंने शानदार 94 रन की पारी खेली। भारत ने उनकी पारी और कप्तान यश ढुल की सेंचुरी की मदद से 290 का बड़ा स्कोर बनाया। और आखिर में 96 रन से जीत हासिल कर लगातार चौथी बार फाइनल में जगह बनाई। रशीद का चयन बहुत आसान नहीं था। पिता-पुत्र के कई दिनों लगातार कई घंटों की मेहनत का नतीजा है। अपने बेटे को मदद करने के लिए पिता की नौकरी दो बार गई। वह अपने पिता को रोजाना स्कूटर पर बैठाकर 12 किलोमीटर लेकर जाते। वहां वह उन्हें थ्रो-डाउन करवाते। फिर वह जब उन्हें मंगलागिरी लेकर जाते, तो यह दूरी उनके घर से 40 किलोमीटर दूर था। यहां वह राज्य और जिला स्तर के कोच के साथ ट्रेनिंग करते थे। उन्हें ऑटोमोबाइल फर्म में नौकरी छोड़नी पड़ी। रोज बेटे की ट्रेनिंग की वजह से वह काम पर लेट हो जाते। रशीद के करियर को बनाने के लिए पिता के सामने आर्थिक चुनौतियां भी थीं। उन्हें अपने बेटे का करियर बनाने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ी। उन्होंने कहा, 'मुझे कम-से-कम दो बार काम पर आने से मना किया गया।' बालिशवली याद करते हुए कहते हैं कि हर गेंद करीब 400 रुपये की आती थी। और किट भी काफी महंगी थी। तो, मैंने उन्हें सिंथेटिक गेंद से प्रैक्टिस करवानी शुरू की। उस कीमत पर हमें तीन-चार सिंथेटिक गेंद मिल जाती थीं। जब टीम वेस्टइंडीज के लिए रवाना हो रही थी तो रशीद ने कहा था, 'मेरे पिता ने इस बात को पूरी तरह आश्वस्त किया कि मेरे पिता को इस बारे में कुछ पता न चले। मुझे पता था कि यह आसान नहीं था लेकिन पिता ने किसी तरह पैसों का इंतजाम किया।' रशीद के पिता के हैदराबाद में रहने वाले दोस्त ने युवा लड़के में टैलंट देखा और खुलकर उनके क्रिकेट करियर के लिए मदद की। बालिशवली ने कहा, 'मेरे दोस्त इंद्र सेना रेड्डी ने बहुत बड़ा दिल दिखाया।' उन्होंने कहा, 'वह हैदराबाद के डॉक्टर हैं और उन्होंने कभी मदद से पीछे नहीं हटे।' इसके साथ ही गुंटूर के उनके कोच जे. कृष्णा राव, जिन्होंने रशीद को करीब 10 साल तक कोचिंग दी ने भी बहुत मदद की। आंध्र के पूर्व कोच, जिन्होंने रशीद में बचपन में ही प्रतिभा देख ली थी, कहा- 'वह बहुत सामान्य परिवार से आते हैं। मैंने इतना समर्पित पिता नहीं देखा। मैं जानता हूं कि अपने बेटे का करियर बनाने के लिए उन्होंने कितना बलिदान दिया है।' रशीद ने कहा, 'बच्चे में क्रिकेट की बड़ी गहरी समझ और चतुराई थी। यह उनके पिता और उनके जुनून के साथ बहुत जरूरी था। यह मेहनत, जुनून और त्याग की कहानी है।' एज-ग्रुप टीमों में सिलेक्ट होने के बाद रशीद ने मुड़कर नहीं देखा। वह नंबर पर बल्लेबाजी करने वाले एक भरोसेमंद बल्लेबाज बन गए। विजय मर्चेंट अंडर-16 ट्रोफी (2018-19) में उ्होंने 168.5 के औसत से 674 रन बनाए। इसमें तीन शतक शामिल थे। उनका सर्वाधिक स्कोर 200 का रहा। इस सीजन वीनू मांकड अंडर-19 ट्रॉफी में उन्होंने छह मैचों में दो शतकों के साथ 376 रन बनाए। औसत रहा 75.2। उन्होंने इंडिया 'ए' की अंडर-19 टीम की कुछ मैचों में कप्तानी भी की। इसमें मौजूदा कप्तान यश ढुल भी उनकी टीम में शामिल थे। रशीद ने उन मैचों में 125 और 30 रन की पारियां खेली थीं। सेमीफाइनल में कप्तान और उपकप्तान का तालमेल गजब का नजर आ रहा था। दोनों ने मिलकर तीसरे विकेट के लिए 204 रन जोड़े। रशीद ने काफी समय तक वाइट बॉल क्रिकेट नहीं खेला। पिछले साल आंध्र प्रीमियर लीग के दौरान उन्होंने इस दिशा में सोचना शुरू किया। उन्होंने कहा था, 'मुझे अच्छा लगा। वहां कई अच्छे खिलाड़ी थे। इनमें केएस भरत भी शामिल थे। मुझे वहां अहसास हुआ कि स्ट्राइक कैसे बदलनी है और पारी को रफ्तार कैसे देनी है। मुझे एपीएल से वाइट बॉल क्रिकेट खेलने का आत्मविश्वास आया। इसके साथ ही मुझे अपनी स्ट्रेंथ भी पता चलीं।' एमएसके प्रसाद, जो गुंटूर से ही आते हैं, काफी समय से रशीद को देख, सुन और फॉलो कर रहे हैं। टीम इंडिया के पूर्व सिलेक्टर को कभी भी रशीद की प्रतिभा पर संदेह नहीं था लेकिन इस कामयाबी का श्रेय वह पिता को देते हैं। उन्होंने कहा, ''मैंने सुना था कि यह लड़का जूनियर क्रिकेट ग्रेड पर अपनी मर्जी से शतक लगाता है। हमें हमेशा पता था कि वह स्पेशल टैलंट है। जब वह 13 साल के थे तो हमने उन्हें छह हफ्ते के लिए इंग्लैंड में स्पेशल ट्रेनिंग के लिए भेजा। उन्होंने काफी कुछ सीखा और अपने फुटवर्क पर अच्छा नियंत्रण हासिल किया। लेकिन मैं इसका श्रेय उनके पिता को दूंगा जिन्होंने अपने बेटे का करियर बनाने के लिए काफी कुछ बलिदान किया। पिता फिर मजाक में कहते हैं, 'सारी मेहनत रंग लाई।'


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