शमी की ढाल बनकर ट्रोल्स के आगे उसी तरह खड़े हैं विराट, जैसे कभी भीड़ से लड़ गए थे नायडू और गावस्कर
नई दिल्ली 'आप हम में से किसी एक को निशाना बनाओगे तो हम सारे 11 मिलकर आपके पीछे पड़ जाएंगे।' इस साल लॉर्ड्स टेस्ट में इंग्लैंड के खिलाड़ियों की स्लेजिंग पर केएल राहुल ने यही कहा था। जिन प्लेयर्स को निशाना बनाया गया, उनमें से एक मोहम्मद शमी थे। शमी पिछले एक हफ्ते से एक खास वर्ग के निशाने पर हैं। पाकिस्तान के खिलाफ मैच के बाद जिस तरह शमी को ट्रोल किया गया, कप्तान विराट कोहली को वह 'बेहद घटिया' लगता है। नायडू और गावस्कर की विरासत संभाल रहे कोहलीअपने साथी के लिए विराट कोहली न सिर्फ खड़े हुए, बल्कि ट्रोल्स को संदेश भी दे दिया कि धर्म या किसी भी आधार पर वह इस टीम को बांट नहीं पाएंगे। शमी के लिए विराट के खड़े होने पर किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। वह बस उस विरासत की ताजा कड़ी भर हैं जिसे सीके नायडू और सुनील गावस्कर जैसे दिग्गज यहां तक लेकर आए हैं। शमी की ट्रोलिंग पर क्या बोले विराट?न्यूजीलैंड के खिलाफ मैच से पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में कोहली से शमी की ट्रोलिंग पर सवाल हुआ। कप्तान ने बेहद साफ शब्दों में कहा कि 'हर कोई अपने धर्म से ऊपर है। यह हर इंसान के लिए एक बहुत ही व्यक्तिगत और पवित्र चीज है और इसे वहीं छोड़ दिया जाना चाहिए।' ट्रोल्स को लेकर कोहली ने कहा कि 'लोग अपनी कुंठा निकालते हैं, क्योंकि उन्हें इस बात की कोई समझ नहीं है कि हम व्यक्तिगत रूप से क्या करते हैं और मैदान पर कितना प्रयास करते हैं।' 'ट्रोल्स पर वक्त बर्बाद नहीं करना चाहता'कोहली ने कहा, 'उन्हें (ट्रोल्स) इस बात की कोई समझ नहीं है कि मोहम्मद शमी जैसे खिलाड़ी ने पिछले कुछ सालों में भारत के लिए कितने मैच जीते हैं और जब टेस्ट क्रिकेट में खेलों पर प्रभाव डालने की बात आती है तो जसप्रीत बुमराह के साथ वह हमारे प्राथमिक गेंदबाज रहे हैं। अगर लोग इसे और देश के लिए उनके जुनून को नजरअंदाज कर सकते हैं, तो ईमानदारी से, मैं अपने जीवन का एक मिनट भी उन लोगों पर ध्यान देने के लिए बर्बाद नहीं करना चाहता।' बैट लेकर भीड़ के सामने खड़े हो गए थे नायडूकोहली जिस तरह से धर्म के आधार पर भेदभाव के खिलाफ खड़े हुए हैं, भारतीय क्रिकेट टीम के पहले कप्तान सीके नायडू को उनपर जरूर गर्व होगा। स्वतंत्रता के बाद ऑस्ट्रेलिया के पहले दौरे की तैयारी के लिए 1947 में क्रिकेटर्स का एक कैम्प पुणे में लगा था। 15 अगस्त से ठीक पहले कई जगहों पर दंगे शुरू हो गए। फजल महमूद ने लाहौर लौटने के लिए बॉम्बे की ट्रेन पकड़ी। सांप्रदायिक तनाव के उस माहौल में एक हिंदू भीड़ ने ट्रेन रुकवा ली और मुस्लिमों को ढूंढ़ने लगे। उसी ट्रेन में नायडू भी सफर कर रहे थे। जब भीड़ फजल को लेने आई तो नायडू अपना बैट उठाकर भीड़ के आगे खड़े हो गए। वह नायडू ही थे जिनके साथ फजल सुरक्षित पहले बॉम्बे लौटे, फिर लाहौर गए। जिस वक्त यह घटना हुई, तब तक नायडू टेस्ट क्रिकेट से रिटायर हो चुके थे। जब गावस्कर ने मुंबई दंगों में एक परिवार को बचायासुनील गावस्कर की गिनती उन दिग्गजों में से होती है जो बेबाकी से अपनी राय रखते हैं। रिटायर होने के कुछ साल बाद, 1992-93 में गावस्कर की अपनी मुंबई में दंगे भड़क उठे थे। गावस्कर तब स्पोर्ट्सफील्ड नाम के अपार्टमेंट में रहते थे। वहां एक भीड़ जुट रही थी। हर फ्लैट पर इंटरकॉम से खबर की गई। किसी को पता नहीं था कि भीड़ एक खास धर्म से ताल्लुक रखने वाले एक ड्राइवर और उसके परिवार के लिए वहां आई थी। जैसे ही भीड़ ने वह कार देखी, उसपर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए। कार इमारत के ठीक सामने रोकी गई। भीतर बच्चे और महिलाएं थीं जो जान की भीख मांग रही थीं। गावस्कर दौड़े-दौड़े नीचे आए और अपार्टमेंट में रहने वाले अपने क्रिकेटर दोस्तों से साथ चलने को कहा। गावस्कर खुद उस भीड़ के आगे खड़े हो गए। कहा कि उन लोगों में से किसी को हाथ लगाने से पहले भीड़ को उनपर हमला करना होगा। गावस्कर जैसे दिग्गज को इस तरह देखकर भीड़ तितर-बितर हो गई और वह परिवार बच गया।
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