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कमाल की कमलप्रीत: लड़कर हारीं कौर, लेकिन देश की लड़कियों को नई राह दिखा दी

तोक्योकमलप्रीत कौर आज किसी पहचान की मोहताज नहीं। ओलिंपिक खेलों में मंगलवार को जब वह डिस्कस थ्रो के फाइनल में उतरी तो पूरी देश की निगाहें उन पर थी। मेडल जरूर हाथ नहीं आया, लेकिन उन्होंने देश की बेटियों को एक नई राह जरूर दिखा दी। यह पहला मौका था जब चक्का फेंक में कोई भारतीय पदक के इतना करीब पहुंचा। 1 अगस्त को 64 मीटर दूर चक्का फेंक कर उन्होंने फाइनल के लिए क्वालीफाई किया था।

कमलप्रीत का फाइनल तक पहुंचना ही भारतीय एथलेटिक्स में बड़ा पल है। अब शायद देश की महिलाएं भी चक्का फेंक और एथलेटिक्स में हाथ आजमाना शुरू कर देंगी।


कमाल की कमलप्रीत: लड़कर हारीं कौर, लेकिन देश की लड़कियों को नई राह दिखा दी

तोक्यो

कमलप्रीत कौर आज किसी पहचान की मोहताज नहीं। ओलिंपिक खेलों में मंगलवार को जब वह डिस्कस थ्रो के फाइनल में उतरी तो पूरी देश की निगाहें उन पर थी। मेडल जरूर हाथ नहीं आया, लेकिन उन्होंने देश की बेटियों को एक नई राह जरूर दिखा दी। यह पहला मौका था जब चक्का फेंक में कोई भारतीय पदक के इतना करीब पहुंचा। 1 अगस्त को 64 मीटर दूर चक्का फेंक कर उन्होंने फाइनल के लिए क्वालीफाई किया था।



लड़कर हारीं कमलप्रीत
लड़कर हारीं कमलप्रीत

अपनी पहली कोशिश में कमल ने 61.62 मीटर का स्कोर किया, इसे कतई खराब नहीं कहा जा सकता, लेकिन पहले राउंड के बाद वह 12 में से छठे स्थान पर रहीं। दूसरे और चौथे प्रयास में पैर आगे निकल गया। इस फाउल के चलते कोई पॉइंट काउंट नहीं हुआ। जबकि पांचवें थ्रो में उन्होंने 61.37 मीटर दूर थ्रो फेंका। छठी और अंतिम कोशिश भी विफल ही रही। इस तरह 63.70 के सर्वश्रेष्ठ प्रयास के साथ उन्होंने छठे स्थान पर फिनिश किया।



​डिप्रेशन के बाद क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था
​डिप्रेशन के बाद क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था

घातक महामारी कोरोना वायरस ने न सिर्फ लोगों के जान-माल का नुकसान किया बल्कि ओलिंपिक की तैयारियों में लगे खिलाड़ियों को भी झटका दिया। लॉकडाउन से कमलप्रीत कौर के मानसिक स्वास्थ्य पर ऐसा झटका लगा कि मनोवैज्ञानिक दबाव से निपटने के लिए उन्होंने गांव में ही क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था।



​कमलप्रीत से देश की मिट्टी की महक आती है
​कमलप्रीत से देश की मिट्टी की महक आती है

पंजाब में काबरवाला गांव की कौर का जन्म किसान परिवार में हुआ। पिछले साल के अंत में वह काफी हताश थी क्योंकि कोविड-19 महामारी के कारण उन्हें किसी टूर्नामेंट में खेलने को नहीं मिल रहा था। उनके गांव के पास बादल में एक साई केंद्र है, और 2014 से पिछले साल तक कमलप्रीत वहीं ट्रेनिंग कर रहीं थीं।



​मां नहीं चाहती थीं बेटी ये सब करे
​मां नहीं चाहती थीं बेटी ये सब करे

परिवार की आर्थिक समस्याओं और अपनी मां के विरोध के कारण वह शुरू में एथलेटिक्स में नहीं आना चाहती थी, लेकिन अपने किसान पिता कुलदीप सिंह के सहयोग से उन्होंने इसमें खेलना शुरू किया। पहले उन्होंने गोला फेंक खेलना शुरू किया, लेकिन बाद में बादल में साई केंद्र में जुड़ने के बाद चक्का फेंक में आ गईं। बादल में कौर के स्कूल की टीचर ने एथलेटिक्स से रूबरू कराया, जिसके बाद वह 2011-12 में क्षेत्रीय और जिला स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगी, लेकिन उन्होंने फैसला किया कि वह अपने पिता पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव नहीं डालेंगी जिन पर संयुक्त परिवार की जिम्मेदारी थी।



​खेल कोटा से लगी रेलवे में नौकरी
​खेल कोटा से लगी रेलवे में नौकरी

2013 में अंडर-18 राष्ट्रीय जूनियर चैंपियनशिप में हिस्सा लिया और दूसरे स्थान पर रहीं। 2014 में बादल में स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया से जुड़ने के अगले ही साल कमलप्रीत राष्ट्रीय जूनियर चैंपियन बन गईं। साल 2016 में उन्होंने अपना पहला सीनियर राष्ट्रीय खिताब जीता। अगले तीन साल तक वह सीनियर राष्ट्रीय खिताब जीतती रहीं, लेकिन इस साल एनआईएस पटियाला में आने के बाद वह सुर्खियों में आईं। रेलवे की कर्मचारी कौर इस साल शानदार फार्म में रही हैं, उन्होंने मार्च में फेडरेशन कप में 65.06 मीटर चक्का फेंककर राष्ट्रीय रेकॉर्ड तोड़ा था और वह 65 मीटर चक्का फेंकने वाली पहली भारतीय महिला बन गईं थीं।





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