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भारत लौटने के बाद अपने एरिया के ट्रक ड्राइवर्स को ढूंढ रही हैं मीराबाई चानू, बताया ये इमोशनल रिश्ता

नई दिल्ली मीराबाई चानू ने देश को पहला मेडल जिताकर दिखा दिया कि समस्याएं आपको रोक नहीं सकती, हां वो आपको परेशान जरूर कर सकती हैं। मीराबाई चानू का भारत में जोरदार स्वागत हुआ। उन पर इनामों की बौछार हुई। लेकिन अगर चानू के जीवन संघर्ष को देखा जाए तो मालूम होगा कि यहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने क्या कुछ नहीं सहा और कितने त्याग किए। चानू अब उन ट्रक ड्राइवर्स से मिलना चाहती हैं, जिन्होंने उनकी कभी मदद की थी। ये ट्रक ड्राइवर चानू को नोंगपोक काकचिंग गांव में उनके घर से खुमान लम्पक स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स प्रशिक्षण केंद्र तक रोज मुफ्त में ले जाता करते थे। ट्रेनिंग में जाना था मुश्किल- चानूहर एथलीट का सपना होता है ओलिंपिक में अपने देश के लिए मेडल जीतना। वेट लिफ्टर मीराबाई चानू भी देश के लिए पदक जीतना चाहतीं थीं। उनका ये सपना पूरा हो गया। वो तोक्यो ओलिंपिक में सिल्वर मेडल जीतीं। चानू का परिवार मुफलिसी में जीवन यापन कर रहा था। उनके माता-पिता उन्हें ट्रेनिंग के लिए प्रतिदिन का खतरा नहीं उठा सकते थे। ट्रक ड्राइवर्स से लेतीं थीं लिफ्टचानू के घर से ट्रेनिंग सेंटर लगभग 30 किलोमीटर दूर था। यहां तक पहुंचने के लिए उनको 10-20 रुपये दिए जाते थे मगर ये कम थे। चानू ने एक तरकीब सोची। चानू ने वहां से गुजरने वाले ट्रक ड्राइवरों से लिफ्ट मांगी। इस वक्त उनको संकोच और डर दोनों साथ चल रहे थे। मगर उन्होंने हिम्मत की और ट्रक से ट्रेनिंग सेंटर जाने लगीं। कुछ दिनों के बाद ट्रक ड्राइवर भी उनको पहचानने लगे थे तो वो दूर से ही हॉर्न दे दिया करते थे ताकि जब तक वो यहां तक पहुंचे तब चानू तैयार हो जाएं। खुद ही चानू को बुलाने लगे थे ड्राइवर्सकुछ दिनों बाद चानू और ट्रक ड्राइवर्स के साथ एक अनोखा रिश्ता बन गया। ड्राइवर दूर से ही हॉर्न बजाते थे और मुझे बताते थे कि वे पास हैं और मुझे तैयार हो जाना चाहिए। ट्रक ड्राइवर मुझसे किराया नहीं लेते थे। जो पैसे उनको किराए के लिए मिलते थे चानू उसी पैसे से मैं अपनी ट्रेनिंग के दौरान कुछ खाने की सामान खरीदती थी।'


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